उत्तर प्रदेशबस्ती

जनप्रतिनिधि बनाम प्रशासन: विकास की पटरी से उतरे तंत्र का सच!

एक चुनी हुई सरकार में यदि जनप्रतिनिधि को अपनी ही प्रशासनिक मशीनरी को जगाने के लिए 'सत्याग्रह' का सहारा लेना पड़ रहा है, तो यह स्पष्ट है कि कहीं न कहीं 'सुशासन' के दावों और धरातल की हकीकत के बीच एक चौड़ी खाई है।

अजीत मिश्रा (खोजी)

संपादकीय: जनप्रतिनिधियों का ‘धरना-प्रदर्शन’—तंत्र की विफलता या व्यवस्था का लाचारपन?

  • सड़क पर क्यों उतरे जनप्रतिनिधि? क्या ‘सुशासन’ के दावों की हवा निकल गई है?
  • थाने और बिजली दफ्तर के आगे धरने की मजबूरी, आखिर कब सुधरेगी शासन की हजूरी?
  • प्रशासन की मनमानी, जनता परेशान; जनप्रतिनिधियों को करना पड़ रहा है अपमान!
  • विकास के बजाय धरने की राजनीति: क्या जनप्रतिनिधियों के पास अब कोई और रास्ता नहीं?
  • पुलिस से बिजली विभाग तक ‘अराजकता’ का साया, जनप्रतिनिधि के सब्र का बांध टूटा!

​लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता और शासन के बीच की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। उनका काम समस्याओं का समाधान करवाना और प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारू बनाए रखना होता है। लेकिन, जब किसी क्षेत्र के जनप्रतिनिधि को बार-बार ‘धरना’ या ‘सत्याग्रह’ का रास्ता अपनाना पड़े, तो यह शासन के सुस्त तंत्र पर सबसे बड़ा सवालिया निशान है।

​हाल ही में सामने आए उदाहरणों ने इस व्यवस्था की पोल खोल दी है। कभी पुलिस प्रशासन द्वारा व्यापारियों के कथित उत्पीड़न का मामला हो, तो कभी बिजली विभाग की मनमानी के खिलाफ नगर पंचायत के उपभोक्ताओं का त्रस्त होना—इन परिस्थितियों ने जनप्रतिनिधियों को सड़क पर उतरने को मजबूर कर दिया है।

आखिर क्यों जनप्रतिनिधियों को बार-बार अपने ही शासन-प्रशासन के खिलाफ खड़ा होना पड़ रहा है?

​इस स्थिति के पीछे कई गंभीर बिंदु उभरकर सामने आते हैं:

  • संवादहीनता का संकट: जब प्रशासनिक अधिकारी जनप्रतिनिधियों की जायज शिकायतों को नजरअंदाज करने लगते हैं, तो बातचीत के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। ‘धरना’ महज एक विरोध नहीं, बल्कि उस संवादहीनता का अंतिम परिणाम है।
  • जवाबदेही का अभाव: जब किसी विभाग के क्रिया-कलापों से जनता त्रस्त हो और विभाग उसे सुधारने में अक्षम या उदासीन हो, तो यह साबित करता है कि शासन के निचले स्तर पर जवाबदेही का घोर अभाव है।
  • दबाव की राजनीति: पुलिस जैसे विभागों पर, जहां जनता को सुरक्षा की उम्मीद होती है, वहां यदि किसी विशिष्ट सिपाही द्वारा व्यापारियों के उत्पीड़न की शिकायतें आती हैं, तो यह पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। जनप्रतिनिधि का थाना परिसर में बैठने की चेतावनी देना, तंत्र के प्रति उनके भरोसे के टूटने का स्पष्ट संकेत है।

क्या यह व्यवस्था का पतन नहीं है?

एक चुनी हुई सरकार में यदि जनप्रतिनिधि को अपनी ही प्रशासनिक मशीनरी को जगाने के लिए ‘सत्याग्रह’ का सहारा लेना पड़ रहा है, तो यह स्पष्ट है कि कहीं न कहीं ‘सुशासन’ के दावों और धरातल की हकीकत के बीच एक चौड़ी खाई है।

​यह समय है कि प्रशासन आत्ममंथन करे। अधिकारियों को यह समझना होगा कि उनकी कार्यशैली का खामियाजा अंततः जनता को भुगतना पड़ता है। यदि जनप्रतिनिधियों की शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई की गई होती, तो शायद उन्हें बार-बार धरने की चेतावनी न देनी पड़ती।

​आखिर कब तक जनप्रतिनिधियों को विकास और जनसमस्याओं के समाधान की जगह, अपने ही तंत्र के खिलाफ सड़क पर संघर्ष करना पड़ेगा? यह प्रश्न न केवल गंभीर है, बल्कि उत्तर भी मांगता है।

​इस स्थिति को सुधारने के लिए आपके क्षेत्र में कौन से ठोस कदम उठाए जाने चाहिए, इस पर आप क्या सोचते हैं?

Show More
Back to top button
error: Content is protected !!